हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) अल्लाह ताला के एक महान नबी और हज़रत मूसा (अलै.) के बड़े भाई थे। वे बनी इसराईल के घराने से ताल्लुक रखते थे। जब अल्लाह ताला ने हज़रत मूसा (अलै.) को तूर पहाड़ पर नबूवत (पैगंबरी) अता की और अत्याचारी बादशाह फ़िरऔन के पास जाकर हक़ की दावत देने का हुक्म दिया, तो हज़रत मूसा ने अल्लाह के हुज़ूर दुआ की।
हज़रत मूसा ने अर्ज़ किया कि फ़िरऔन बेहद ज़ालिम और ताकतवर है, और मेरी ज़ुबान में थोड़ी हकलाहट है। इसलिए मेरे बड़े भाई हारून को, जो मुझसे ज़्यादा साफ़ और सुरीली ज़ुबान में बोलते हैं, मेरा वज़ीर (मददगार) बनाकर मेरे साथ नबूवत की ज़िम्मेदारी में शरीक फ़रमा दीजिए।
"और मेरे घराने से मेरे भाई हारून को मेरा वज़ीर बना दे। उसके ज़रिए मेरी कमर मज़बूत कर और उसे मेरे काम में शरीक कर दे।"
अल्लाह ताला ने हज़रत मूसा की दुआ क़बूल फ़रमाई और हज़रत हारून (अलै.) को भी नबूवत के आला ओहदे से नवाज़ा।
हज़रत मूसा और हज़रत हारून दोनों भाई एक साथ फ़िरऔन के दरबार में पहुंचे। उन्होंने बिना किसी ख़ौफ़ के फ़िरऔन को एक अल्लाह की इबादत करने और बनी इसराईल पर ज़ुल्म बंद करने की दावत दी। हज़रत हारून ने अपनी मधुर और प्रभावशाली ज़ुबान से फ़िरऔन को समझाया और हज़रत मूसा के मोज़िज़ों (चमत्कारों) को पेश करने में उनका पूरा साथ दिया।
फ़िरऔन ने घमंड में आकर उनकी बात मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों भाइयों ने फ़िरऔन के जादूगरों का मुकाबला किया और अल्लाह के हुक्म से बनी इसराईल को मिस्र की गुलामी से आज़ाद कराकर लाल सागर (Red Sea) पार कराया, जहाँ फ़िरऔन अपनी पूरी फ़ौज के साथ डूबकर हलाक हो गया।
फ़िरऔन के ख़ात्मे के बाद जब बनी इसराईल सीना के रेगिस्तान में पहुंची, तो अल्लाह ताला ने हज़रत मूसा (अलै.) को तूर पहाड़ पर 40 रातों के लिए अहकाम (तौरात) हासिल करने के लिए बुलाया। जाने से पहले हज़रत मूसा ने अपनी कौम (बनी इसराईल) की ज़िम्मेदारी अपने भाई हज़रत हारून को सौंपी और हिदायत दी कि कौम में सुधार बनाए रखना और उपद्रवियों के रास्ते पर मत चलना।
हज़रत मूसा के जाने के बाद सामरी नाम के एक चालाक और गुमराह शख्स ने बनी इसराईल के लोगों से उनके सोने के ज़ेवर इकट्ठे किए और आग में पिघलाकर सोने बछड़े का एक मुजस्सिमा (मूर्ति) तैयार किया, जिसके अंदर से गाय जैसी आवाज़ निकलती थी। सामरी ने कौम से कहा कि यह तुम्हारा और मूसा का रब है।
जब बनी इसराईल के लोग उस बछड़े की पूजा करने लगे, तो हज़रत हारून (अलै.) को बेहद दुख हुआ। उन्होंने कौम को रोकते हुए कहा:
"ऐ मेरी कौम! इस बछड़े के ज़रिए तुम्हारी आज़माइश की गई है। तुम्हारा रब तो रहमान (अल्लाह) है, इसलिए मेरी पैरवी करो और मेरे हुक्म की पैरवी करो।"
लेकिन गुमराह कौम ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया और कहा कि जब तक मूसा वापस नहीं आ जाते, हम इस बछड़े की पूजा करते रहेंगे। हज़रत हारून ने देखा कि कौम दो टुकड़ों में बंट रही है और गृहयुद्ध की स्थिति बन रही है। उन्होंने सब्र से काम लिया ताकि हज़रत मूसा के आने तक कौम आपस में लड़कर तबाह न हो जाए।
जब हज़रत मूसा (अलै.) तूर पहाड़ से तौरात की तख्तियां लेकर लौटे और अपनी कौम को बछड़े की पूजा करते देखा, तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। उन्होंने भारी दुख और गुस्से में हज़रत हारून की दाढ़ी और सिर के बाल पकड़कर पूछा कि तुमने कौम को इस गुमराही से क्यों नहीं रोका?
हज़रत हारून (अलै.) ने बड़े प्यार और नरमी से जवाब दिया:
"ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरे बाल और सिर न पकड़ो। मुझे डर था कि आप आकर कहेंगे कि तुमने बनी इसराईल में फूट डाल दी और मेरी बात का इंतज़ार नहीं किया। इन लोगों ने मुझे कमज़ोर समझा और कत्ल करने पर आमादा हो गए थे।"
जब हज़रत मूसा को हक़ीक़त का अंदाज़ा हुआ, तो उनका गुस्सा शांत हो गया। उन्होंने अल्लाह से दुआ की: "ऐ रब! मुझे और मेरे भाई हारून को मुआफ़ फ़रमा दे और हमें अपनी रहमत में दाख़िल कर ले।" इसके बाद सामरी को कौम से बेदखल कर दिया गया और उस सोने के बछड़े को जलाकर दरिया में बहा दिया गया।
हज़रत हारून (अलै.) अपने स्वभाव से बेहद नरम-दिल, दयालु और सहिष्णु थे। बनी इसराईल के लोग भी उनसे बहुत मोहब्बत करते थे। हज़रत मूसा (अलै.) की वफ़ात से कुछ समय पहले ही सीना के रेगिस्तान (तीह के मैदान) में हज़रत हारून (अलै.) की वफ़ात हुई। उनकी वफ़ात पर पूरी बनी इसराईल में गहरा शोक छा गया था।